ख़ान साहब – एक हिस्सा शिमला का

शिमला में काफ़ी सालों के बाद इतनी जबरदस्त बर्फ़बारी हुई |  गिरती हुई बर्फ सबको पसंद होती है और जमी हुई बर्फ किसी को भी नहीं क्यूंकी उसमें आदमी, गाड़ी, जानवर सब फिसलते हैं| अभी मेरे सामने ही कई लोग फिसले, किसी की गाड़ी टूटी तो किसी की टाँग|  नये बने हुए बस अड्डे के पास तो एक गाड़ी खाई में गिर गयी और पाँच लोग मारे गये, यकीन मानिए जमी हुई बर्फ पे चलना बड़ा मुश्किल और चुनौती भरा काम है|  और उसके उपर शिमला की चढ़ाई और सीढ़ियाँ , घुटने के “फ्ल्यूड” ख़तम हो जाए इतनी चढ़ाई और सीढ़ियाँ हैं शिमला में|  पर माल रोड पर पहुँचकर सब दर्द गायब हो जाता है, बर्फ, धूप, रिज़, चर्च, लड़कियाँ (सब एक जैसी दिखती हैं, सीधे बाल, पतली काया), खाना, पीना, और शॉपिंग|

इस सबके बीच आपको सब जगह, चाहे लोअर बाजार, कार्ट रोड, या हाई कोर्ट, कश्मीरी ख़ान दिखेंगें, किसी की पीठ पे २०-२५ पेटियाँ होंगी, तो किसी की पीठ पे अलमारी, किसी के पाँव में रस्सी बँधी होगी ताकि बर्फ में चलने में आसानी हो, तो किसी के सर घुटनों तक पहुँच गया होगा, बोझे के भार की अधिकता से|  जिस बर्फ में खाली हाथ चलने में परेशानी हो जाती है, अपना वजन तक नहीं संभलता, उसी बर्फ में ये लोग १००-५० किलो बड़े आराम से उठा के चलते हैं|  बर्फ में पाँव पे रस्सी बाँध के जब ये लोग चलते हैं तो इनका “बॉडी बेलेन्स” देखने लायक होता है|  सुबह होते ही ये दूध से भरे हुए कनस्तर उठाके जाखू मंदिर की ओर कूच कर देते हैं, और बिल्कुल सही वक़्त पे|  ऐसे ही नहीं इन्हें पहाड़ी ऊँट कहा जाता|

जब मैने एक कश्मीरी ख़ान से बात करने की कोशिश की तो सबसे पहले उसने मुझे चाय के लिए पूछा, मुझे लगा की वो चाय पीना चाहता है पर वो मुझे चाय की ऑफर दे रहा था| कहता आओ साहब आपको चाय पिलाते हैं|

बात करने पे मालूम पड़ा कि अधिकतर कश्मीरी ख़ान अनंतनाग और उसके आस पास के इलाक़े से शिमला आते हैं, कुछ को यहाँ रहते हुए ३५-४० साल हो चुके हैं, तो कुछ सिर्फ़ सोलह-सत्रह साल के लड़के हैं, जो देखने में आप और मुझसे भी कमजोर दिखेंगे लेकिन बोझा उठाने में “द ग्रेट खली” से भी मजबूत|  शिमला में बिना ख़ान के जीवन-यापन काफ़ी मुश्किल है, चाहे वो फिर लोअर बाजार में सब्जी पहुँचने का काम हो या फिर माल रोड पे “आइस-क्रीम” की पेटियाँ पहुँचाने काम हो या फिर “त्रिशूल बकेरी” में पेस्ट्री पहुँचने का काम हो|

रज्जाक, यासिर, अहमद, सब एक ही गाँव से हैं और पिछले १५ सालों से शिमला में रहते हैं| उन्होने इस शहर को बड़ी नज़दीकी से देखा है और अनंतनाग से ज़्यादा जानकारी उन्हें शिमला के बारे में है|  उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें उनके नाम से बुलाते हैं|  वैसे तो सबको ख़ान ही कहा जाता है और उन्हें बुरा नहीं लगता पर अगर किसिको नाम से बुलाया जाए तो वो कहावत सिद्ध हो जाती है जो कभी मैने ट्रक के पीछे पढ़ी थी, “प्यार से बात करो इज़्ज़त मुफ़त मिलेगी”|  ख़ान पहले सिर्फ़ बोझा ढोते थे पर अब कुछ स्मार्ट ख़ान टूरिस्ट गाइड बन गये हैं, जो बस अड्डे और “१०३ टॅनल” पे सवारियों को धर दबोचते हैं, होटेल और “टूरिस्ट पॅकेजस” के लिए|

 

सब ख़ान लोग मस्जिदों में रहते हैं, शिमला में पाँच मस्जिद हैं और हर एक मस्जिद में आपको ख़ान मिल जाएँगे|  एक मस्जिद में सिर्फ़ कश्मीरी ख़ान रहते हैं और जामा मस्जिद में सबसे ज़्यादा|  एक बड़े से हाल में १५०-२०० ख़ान रहते हैं, ज़मीन पे चटाई बिछा के|  मस्जिद में मिलजुलकर ये लोग रहते हें, किराया, भाड़ा, खाना, पीना, सब मस्जिद के अन्दर ही होता है|  अन्दर ही टेलर मास्टर बैठता है और सबके चोगे सिलता है, बड़े बड़े चोगे जो कश्मीरी खान अक्सर माल रोड पे पहन के घुमते हैं|  जब हम उनसे बात करने गये तो पहले उन्हें लगा की कोई पत्रकार आ गये और घुसते ही “लीडर ऑफ द हाउस” ने कह दिया कि हम आपको कुछ नहीं बता सकते, हमारे पास कुछ नया नहीं है बताने को|  अगर आपको मसला सुलझाना है तो हमसे बात कीजिए नहीं तो हमें माफ़ कीजिए|

वो ख़ान साहब पिछले ३५ साल से शिमला में रहते हैं और उन्हें लगता है की अब वक़्त बदल रहा है|  लोग अब पहले जैसे नहीं रहे, अब वो पहाड़ी सादगी नहीं रही शिमला के लोगों में|  हालाँकि उन्हें आज तक मुसलमान होने या मजदूर होने से कभी कोई दिक्कत नहीं आई शिमला में लेकिन अब शिमला वो पुराना शिमला नहीं रहा|  उनका ये भी मानना है की हिमाचल के लोग देश में सबसे अच्छे हैं|  अब जब देश के हालात बदल रहे हैं तो इनको भी दिक्कत आती है, जितनी बार घर जाओ उतनी बार पोलीस से वेरिफाइ  करा के लाओ  की “केरेक्टर ठीक है”|

एक दिक्कत और है और वो है शिमला का सौन्दर्यीकरण , जिसकी वजह से जो “रेस्टिंग-प्लेसेस” अंग्रेजों ने बनवाए थे वो हिमाचल सरकार तोड़ रही है| ये “रेस्टिंग-प्लेसेस” काम आते थे सामान रख के सांस लेने के लिए, पर अब जब ये तोड़े जा रहे हैं, ना सिर्फ खान लोग बल्कि टूरिस्ट लोगों को भी सामान उठाके चलने में दिक्कत हो रही है|  खैर, असली दिक्कत तो टूरिस्ट की है, खान अक्सर मेनेज  कर लिया करते हैं|

जितने भी लोग शादीशुदा थे उन सबके बच्चे पढ़ लिख रहे हैं, सब अपनी लड़कियों को भी स्कूल भेजते हैं क्यूंकी उन्हें मालूम है की पढ़ेंगे लिखेंगे तभी भला होगा, खुद का भी और देश का भी| हमने उन्हें कहा की हम कोई मसला सुलझाने नहीं आए, हम सिर्फ़ धन्यवाद कहने आए हैं, आपको और आपके भाइयों को क्यूंकी बिना आपके शिमला शिमला नहीं रहेगा|

अगर आप कभी शिमला जाओ और आपकी नजर और ध्यान में कोई खान आये तो उसे धन्यवाद् कह देना|

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